1. विशेष पड़ताल: भारत में COBSE जैसी संस्थाएं क्यों पनप जाती हैं और इनका कानूनी सच क्या है?
कानूनी स्थिति: COBSE वास्तव में क्या है?
Council of Boards of School Education in India (COBSE) कोई संसद (Parliament) के कानून द्वारा बनाई गई सांविधिक संस्था (Statutory Body) नहीं है। यह 'सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860' के तहत रजिस्टर्ड एक निजी और स्वैच्छिक सोसाइटी (Voluntary Society) है। जिस तरह कोई क्लब या एसोसिएशन बनता है, उसी तरह COBSE भी एक रजिस्टर्ड सोसाइटी है।
मान्यता (Recognition) और फर्जी बोर्ड लिस्ट का भ्रम
पिछले कुछ दशकों में देश में यह भ्रांति फैला दी गई कि COBSE देश के स्कूल बोर्ड्स को मान्यता देने वाली सुप्रीम संस्था है। यह संस्था अपनी वेबसाइट पर 'Approved Boards' और 'Fake Boards' की लिस्ट जारी करती है। लेकिन कानूनी हकीकत यह है कि किसी भी प्राइवेट सोसाइटी को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी राज्य सरकार द्वारा विधानसभा एक्ट से बनाए गए बोर्ड को अवैध या फर्जी घोषित कर सके।
शिक्षा मंत्रालय (MHRD/MoE) का आधिकारिक रुख और सर्कुलर
शिक्षा मंत्रालय (तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय - MHRD) ने कई आरटीआई और स्पष्टीकरणों में साफ किया है कि केंद्र सरकार ने COBSE को कोई रेगुलेटरी या एक्रीडिटेशन अधिकार नहीं दिया है। भारत में किसी भी शिक्षा बोर्ड की मान्यता केवल निम्नलिखित आधारों पर तय होती है:
मेंबरशिप फीस और आम जनता की आंखों में धूल
शिक्षाविदों और जानकारों का आरोप है कि प्राइवेट काउंसिल बोर्ड्स से सालाना लाखों रुपये की मेंबरशिप और प्रोसेसिंग फीस वसूलती हैं। जो स्वायत्त या नए राज्य बोर्ड इनकी भारी-भरकम फीस देकर सदस्य नहीं बनते, उनकी अनुपस्थिति को हथियार बनाकर यह भ्रम फैलाया जाता है कि वे मान्य नहीं हैं। इससे लाखों छात्रों, अभिभावकों और कंसल्टेंट्स के बीच घबराहट पैदा होती है।
सरकारी अधिकारी और राज्य सरकारें खामोश क्यों?
कई बार राज्य सरकारों के शिक्षा अधिकारी और प्रशासनिक प्रतिनिधि इनके सेमिनारों और सम्मेलनों में मंच साझा करते हैं। इस आपसी तालमेल के कारण आम जनता को लगता है कि यह कोई सरकारी विभाग है। जब तक सरकारें बड़े स्तर पर जन-जागरूकता नहीं चलातीं, तब तक प्राइवेट संस्थाएं इस प्रशासनिक अस्पष्टता का फायदा उठाती रहेंगी।
2. ग्राउंड जीरो रिपोर्ट: प्राइवेट सोसाइटी का एकाधिकार, अफसरों का संरक्षण और छात्रों का भविष्य दांव पर
नई दिल्ली / विशेष संवाददाता: भारत का शिक्षा तंत्र दुनिया के सबसे बड़े तंत्रों में से एक है, लेकिन इसी तंत्र के साए में एक ऐसा खेल चल रहा है जिसने लाखों छात्रों, अभिभावकों और शिक्षण संस्थानों की नींद उड़ा रखी है। नाम है— Council of Boards of School Education in India (COBSE)। पहली नजर में यह नाम किसी भारी-भरकम संवैधानिक या सरकारी नियामक आयोग जैसा लगता है। लेकिन जब आप इसकी कानूनी परतों को उधेड़ते हैं, तो सामने आता है एक ऐसा सच जो देश के शिक्षा नीति-निर्माताओं और नौकरशाही पर सीधे तमाचा जड़ता है।
भाग 1: मेंबरशिप का 'हफ्ता वसूली' मॉडल — जो चंदा दे वो मान्य, जो न दे वो फर्जी!
COBSE के पूरे कामकाज का मॉडल किसी कॉर्पोरेट सिंडिकेट जैसा है। यह संस्था राज्यों के शिक्षा बोर्ड्स, ओपन स्कूल्स और स्वायत्त बोर्ड्स से सालाना लाखों रुपये की मेंबरशिप फीस और प्रोसेसिंग चार्ज वसूलती है।
अब खेल समझिए: यदि कोई राज्य सरकार अपने विधानसभा एक्ट या गजट नोटिफिकेशन के जरिए कोई नया ओपन स्कूल या माध्यमिक बोर्ड बनाती है, और वह बोर्ड COBSE की महंगी मेंबरशिप फीस देने से इनकार कर देता है या उसका सदस्य नहीं बनता, तो COBSE उसे अपनी 'मान्यता प्राप्त सूची' से बाहर रखती है। इतना ही नहीं, इंटरनेट और विभिन्न माध्यमों से यह नैरेटिव सेट कर दिया जाता है कि जो बोर्ड COBSE की लिस्ट में नहीं है, वह संदेहास्पद या 'अन-रिकॉग्नाइज्ड' है!
सवाल यह है कि जनता के टैक्स से चलने वाले और विधानसभा के कानून से बने राज्य बोर्ड्स को एक प्राइवेट सोसाइटी को लाखों रुपये की मेंबरशिप फीस क्यों देनी चाहिए? क्या बिना किसी प्राइवेट क्लब की पर्ची कटाए सरकारी बोर्ड मान्य नहीं माने जाएंगे?
भाग 2: 2017 का वो ऐतिहासिक सर्कुलर — जब शिक्षा मंत्रालय ने COBSE के पर कतरे थे
यह कोई नई बात नहीं है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD - अब शिक्षा मंत्रालय) के पास जब COBSE की मनमानी और गलत दावों की शिकायतें पहुंचीं, तो मंत्रालय को आधिकारिक ऑफिस मेमोरेंडम (OM) और सर्कुलर जारी करना पड़ा था।
मंत्रालय ने अपने पत्राचार में साफ शब्दों में रेखांकित किया था कि:
इसके बावजूद, यह सर्कुलर फाइलों में दबा दिया गया और आम जनता तक कभी नहीं पहुंचने दिया गया, ताकि प्राइवेट काउंसिल का यह एकाधिकार बेरोकटोक चलता रहे।
भाग 3: सरकारी अधिकारियों और नौकरशाही की रहस्यमयी खामोशी — मिलीभगत या आंखें मूंदना?
सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल नौकरशाही पर उठता है। जब शिक्षा मंत्रालय को पता है कि COBSE एक प्राइवेट सोसाइटी है, तो फिर राज्य सरकारों के शिक्षा सचिव, बोर्ड्स के चेयरमैन और आला अधिकारी इनके फाइव-स्टार सेमिनारों और एनुअल कॉन्फ्रेंसेस में मुख्य अतिथि बनकर क्यों जाते हैं?
जब सरकारी अफसर इनके मंच पर बैठकर फोटो खिंचवाते हैं, तो आम जनता, भोले-भाले छात्रों और छोटे शहरों के प्रिंसिपलों को लगता है कि यह कोई भारत सरकार का ही बोर्ड है। अधिकारियों की इसी चुप्पी और मौन समर्थन की बदौलत COBSE जैसी संस्थाएं देश के पूरे स्कूल एजुकेशन सिस्टम पर अपनी अदृश्य हुकूमत चला रही हैं।
भाग 4: छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ और एडमिशन का डर
इस पूरे सिंडिकेट का सबसे दर्दनाक शिकार देश का आम छात्र होता है। जब कोई छात्र किसी राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त ओपन बोर्ड या ऑटोनॉमस बोर्ड से 10वीं या 12वीं पास करता है, तो कॉलेज और यूनिवर्सिटी के एडमिशन क्लर्क COBSE की वेबसाइट खोलकर बैठ जाते हैं। यदि उस लिस्ट में बोर्ड का नाम नहीं दिखा, तो छात्र का एडमिशन रोक दिया जाता है या उसे 'फर्जी' बताकर लौटा दिया जाता है।
सोचिए, एक छात्र जिसने राज्य सरकार के कानून से बने बोर्ड से पढ़ाई की, उसे एक प्राइवेट एनजीओ की लिस्ट की वजह से अपनी डिग्री और करियर गंवाना पड़ता है! यह संविधान के 'अनुच्छेद 14 और 21' (समानता और शिक्षा का अधिकार) का खुला उल्लंघन है।
भाग 5: अब आर-पार का वक्त — सरकार को तुरंत लेने होंगे ये 4 बड़े फैसले
यदि सरकार सचमुच छात्रों के भविष्य को लेकर गंभीर है, तो उसे तुरंत निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:




