COBSE का विधिक परीक्षण: क्या 1860 की एक निजी सोसाइटी भारत के संप्रभु शिक्षा तंत्र पर समानांतर हुकूमत चला सकती है?
प्रस्तावना एवं विचारणीय विधिक प्रश्न (BEFORE THE COURT OF PUBLIC REASON & CONSTITUTIONAL SCRUTINY):
प्रस्तुत विधिक आरोप-पत्र भारतीय न्यायशास्त्र के अत्यंत गंभीर, संवेदनशील एवं दूरगामी संवैधानिक संकट को रेखांकित करता है। यह संकट सीधे तौर पर भारत के उन करोड़ों विद्यार्थियों के मौलिक अधिकारों से जुड़ा है, जो राज्य के विधानमंडलों एवं संसद द्वारा पारित संप्रभु कानूनों के तहत स्थापित शिक्षा बोर्डों से योग्यता प्राप्त करते हैं, किंतु एक गैर-सांविधिक, निजी एवं स्वैच्छिक सोसाइटी द्वारा संचालित अप्राधिकृत सूचीकरण तंत्र के कारण अपनी आजीविका, उच्च शिक्षा एवं मौलिक गरिमा से वंचित कर दिए जाते हैं।
वर्तमान न्यायिक विवेचना का मुख्य विचारणीय प्रश्न यह है कि: "क्या भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 एवं समवर्ती सूची (List III) की प्रविष्टि 25 के तहत विधिवत निर्वाचित राज्य विधानसभाओं द्वारा निर्मित सांविधिक बोर्डों को अपनी वैधता साबित करने के लिए किसी निजी सोसाइटी (COBSE) के समक्ष नतमस्तक होकर वार्षिक सदस्यता शुल्क देना अनिवार्य है? और यदि कोई सांविधिक बोर्ड ऐसा करने से इनकार करता है, तो क्या उस निजी सोसाइटी को उस बोर्ड को अप्रमाणित अथवा संदेहास्पद घोषित करने का कोई विधिक प्राधिकार प्राप्त है?"
विधिक हैसियत का छल — 'सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860' का मुखौटा बनाम सांविधिक आयोग
1.1. काउंसिल ऑफ बोर्ड्स ऑफ स्कूल एजुकेशन इन इंडिया (COBSE) का नाम प्रथम दृष्टया किसी संवैधानिक, संसद्-निर्मित अथवा केंद्रीय नियामक आयोग (Regulatory Commission) का आभास कराता है। यह नामकरण जनसामान्य, विद्यार्थियों, अभिभावकों एवं विश्वविद्यालयी कर्मचारियों के मन में यह भ्रामक विश्वास उत्पन्न करता है कि यह संस्था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC Act, 1956), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE Act, 1987) अथवा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE Act, 1993) की भांति संसद के किसी विशेष अधिनियम द्वारा गठित सांविधिक नियामक है।
1.2. अभिलेखीय एवं विधिक प्रमाणों से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि COBSE का गठन संसद के किसी अधिनियम (Act of Parliament) द्वारा नहीं किया गया है। यह केवल और केवल 'सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860' (Act XXI of 1860) के अंतर्गत पंजीकृत एक निजी, स्वैच्छिक एवं गैर-सांविधिक सोसाइटी है।
1.3. भारतीय न्यायशास्त्र का यह सुस्थापित सिद्धांत है कि 1860 के सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम के तहत निगमित किसी भी संस्था को संप्रभु विधायी (Sovereign Legislative), विनियामक (Regulatory) अथवा दंडात्मक (Adjudicatory) शक्तियां प्राप्त नहीं होती हैं। सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत बनी संस्था का विधिक दायरा मात्र उसके पंजीकृत सदस्यों के आंतरिक समन्वय एवं स्वैच्छिक गतिविधियों तक ही सीमित होता है।
1.4. विधिक सिद्धांत 'Ultra Vires' (अधिकारतीत) के अनुसार, जब कोई निजी सोसाइटी अपने पंजीकृत ज्ञापन (Memorandum of Association) और विधिक सीमाओं से बाहर जाकर देश भर के स्कूल बोर्डों पर नियामक नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास करती है या 'मान्यता' व 'फर्जी बोर्ड' की सार्वजनिक सूचियां जारी करती है, तो उसका प्रत्येक ऐसा कृत्य विधि की दृष्टि में सर्वथा शून्य (Null and Void Ab Initio) होता है।
संवैधानिक संघवाद एवं विधायिका की संप्रभुता पर आघात
2.1. भारतीय संविधान का सातवां परिशिष्ट (Seventh Schedule) केंद्र एवं राज्यों के मध्य विधायी शक्तियों का विभाजन करता है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के पश्चात 'शिक्षा' को समवर्ती सूची (Concurrent List) की प्रविष्टि संख्या 25 के अंतर्गत समाविष्ट किया गया है।
2.2. संविधान के अनुच्छेद 246(2) एवं 246(3) के अंतर्गत भारत की प्रत्येक राज्य विधानसभा को अपने राज्य क्षेत्र के भीतर माध्यमिक, उच्च माध्यमिक, मदरसा, संस्कृत एवं मुक्त विद्यालयी शिक्षा (Open Schooling) के संचालन हेतु अधिनियम पारित करने का पूर्ण संप्रभु अधिकार प्राप्त है।
2.3. जब किसी राज्य की विधानसभा में कोई शिक्षा विधेयक प्रस्तुत होता है, दोनों सदनों (जहां लागू हो) द्वारा पारित किया जाता है, महामहिम राज्यपाल (Governor) की औपचारिक स्वीकृति प्राप्त होती है और वह राज्य के आधिकारिक राजपत्र (Official State Gazette) में प्रकाशित हो जाता है, तो वह बोर्ड एक 'सांविधिक निकाय' (Statutory Legal Body) बन जाता है। उदाहरणार्थ:
2.4. विधिक प्रश्न यह उठता है कि जिस बोर्ड की वैधता स्वयं भारत के संविधान के अनुच्छेद 246 और राज्य विधानमंडल के संप्रभु कानून से उद्भूत होती है, क्या उस बोर्ड को किसी निजी सोसाइटी की सूची में शामिल होने की कोई संवैधानिक आवश्यकता है? उत्तर पूर्णतः नकारात्मक है। किसी भी निजी सोसाइटी द्वारा राज्य विधायिका के अधिनियम से निर्मित बोर्ड को मान्यता की कसौटी पर तौलना संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) और संघीय सिद्धांतों (Federalism) का खुला अपमान है।
शिक्षा मंत्रालय का 2017 का ऐतिहासिक परिपत्र — प्राधिकार का स्पष्ट खंडन
3.1. जब देश भर से यह शिकायतें प्राप्त हुईं कि COBSE स्वयं को केंद्र सरकार का अंग बताकर कार्य कर रही है और अपने नाम का दुरुपयोग कर रही है, तब केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD - वर्तमान शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार) के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने इस पर अत्यधिक कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया था।
3.2. मंत्रालय के आधिकारिक कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) एवं पत्राचार में निम्नलिखित तथ्य निर्विवाद रूप से दर्ज किए गए:
3.3. इस अकाट्य साक्ष्य के बावजूद, इस परिपत्र का व्यापक प्रचार-प्रसार न होना और इसे प्रशासनिक अलमारियों में दबाए रखना उस गहरी सांठगांठ की ओर संकेत करता है, जिसने इस निजी संस्था के अवैध एकाधिकार को निरंतर पोषित किया।
सदस्यता शुल्क का व्यावसायिक मॉडल — 'शुल्क दो अन्यथा बहिष्कृत हो'
4.1. COBSE का संपूर्ण कार्यकरण एक संगठित वाणिज्यिक सिंडिकेट की भांति संचालित होता है, जिसका मुख्य आधार 'वार्षिक सदस्यता शुल्क' (Annual Membership & Processing Fees) है।
4.2. कार्यप्रणाली का विधिक विश्लेषण:
4.3. भारतीय न्यायशास्त्र के अनुसार, किसी सार्वजनिक संस्था के अधिकार को बंधक बनाकर उससे चंदा अथवा सदस्यता शुल्क की मांग करना और शुल्क न देने पर उसके छात्रों के भविष्य को संकट में डालना भारतीय दंड संहिता / भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत जबरन वसूली (Extortion), आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust) तथा छल (Cheating under Section 420/318 BNS) के तत्वों को आकर्षित करता है।
लोक सेवकों की संलिप्तता एवं 'Misfeasance in Public Office'
5.1. भारतीय प्रशासनिक विधि (Administrative Law) में 'Misfeasance in Public Office' (लोक पद का दुरुपयोग एवं कर्तव्य विमुखता) एक गंभीर दुष्कृत्य (Tort) तथा अपराध है।
5.2. विधिक साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि केंद्र एवं राज्य सरकारों के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी, शिक्षा सचिव, विश्वविद्यालयों के कुलपति एवं विभिन्न बोर्डों के अध्यक्ष COBSE द्वारा आयोजित भव्य पंच-सितारा सम्मेलनों (Conferences) में नियमित रूप से मंच साझा करते रहे हैं।
5.3. जब कोई वरिष्ठ लोक सेवक किसी निजी गैर-सांविधिक सोसाइटी के बैनर तले मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होकर तस्वीरें खिंचवाता है, तो वह अनजाने में अथवा जानबूझकर उस निजी संस्था को 'राजकीय प्राधिकार का आभास' (Colour of State Authority) प्रदान करता है।
5.4. इस कृत्य से देश के लाखों ग्रामीण, दूरदराज के नागरिकों एवं प्रवेश अधिकारियों में यह अकाट्य भ्रम उत्पन्न होता है कि यह निजी संस्था ही सरकार है। लोक सेवकों की यह आपराधिक उपेक्षा और मौन सहमति सीधे तौर पर उस शोषणकारी व्यवस्था को संरक्षण प्रदान करती है जो संविधान के शासन के सर्वथा प्रतिकूल है।
नागरिकों के मौलिक अधिकारों का क्रूर हनन
6.1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। जब एक ही राज्य विधानमंडल के कानून से उत्तीर्ण दो छात्रों में से एक को केवल इसलिए प्रवेश से वंचित कर दिया जाता है क्योंकि उसके बोर्ड ने किसी निजी दिल्ली-स्थित क्लब को चंदा नहीं दिया, तो यह अनुच्छेद 14 का नग्न उल्लंघन है। यह मनमाना, तर्कहीन एवं असंवैधानिक वर्गीकरण है।
6.2. संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का पेशा, व्यवसाय अथवा रोजगार चुनने की स्वतंत्रता देता है। छात्रों की वैध 10वीं/12वीं की अंकतालिका को COBSE लिस्ट के नाम पर अस्वीकार कर उन्हें सरकारी नौकरियों (जैसे UPSC, SSC, रेलवे, राज्य पुलिस बल, बैंक भर्ती) में बैठने से रोकना उनके आजीविका के अधिकार पर सीधा कुठाराघात है।
6.3. सर्वोच्च न्यायालय ने 'उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' तथा 'के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ' के ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्थापित किया है कि गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) में निर्बाध शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार अंतर्निहित है। एक निजी सोसाइटी के अनधिकृत कृत्यों के कारण लाखों निर्दोष छात्रों के शैक्षणिक करियर को बर्बाद करना अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।




